गुरुग्राम:
हरियाणा के गुरुग्राम शहर में गुरुवार को एक दिल दहला देने वाली घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। एक पिता ने अपनी ही बेटी की पीठ पर तीन गोलियां मारकर उसकी हत्या कर दी। यह बेटी कोई आम लड़की नहीं थी, बल्कि राज्य स्तरीय टेनिस खिलाड़ी राधिका यादव थी, जिसकी उम्र महज 25 साल थी। यह हत्या उनके ही घर में हुई, जहां राधिका अपने परिवार के साथ रहती थी।
पुलिस की प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि पिता अपनी बेटी के टेनिस अकेडमी चलाने से नाराज थे। इस बात को लेकर अक्सर घर में विवाद होता रहता था, लेकिन किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह विवाद एक दिन इतनी खौफनाक मोड़ ले लेगा।
घटना की शुरुआत: गोली चलने की सूचना
गुरुवार की सुबह लगभग 11:30 बजे पुलिस को एक निजी अस्पताल से सूचना मिली कि एक युवती को गोली लगी है। जैसे ही सूचना मिली, सेक्टर-56 थाना पुलिस फौरन अस्पताल पहुंची। वहां पहुंचने पर पता चला कि युवती की पहचान राधिका यादव के रूप में हुई है और उसे गोली मारने वाला कोई और नहीं बल्कि उसका अपना पिता दीपक यादव है।
घटनास्थल की जांच
घटना के बाद पुलिस उपायुक्त (पूर्व), थाना प्रभारी, एफएसएल (फॉरेंसिक साइंस लैब), सीन ऑफ क्राइम और फिंगरप्रिंट विशेषज्ञों की टीम मौके पर पहुंची। उन्होंने घर की जांच की और घटनास्थल से सबूत जुटाए। शव को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में भिजवा दिया गया है।
पीठ पर मारी गईं तीन गोलियां
पुलिस जांच में यह बात सामने आई है कि आरोपी पिता दीपक यादव ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर से राधिका की पीठ पर तीन गोलियां मारीं। गोली लगने के बाद राधिका को तुरंत पास के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया, लेकिन वहां उसकी हालत गंभीर बनी रही और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
कौन थी राधिका यादव?
राधिका यादव कोई सामान्य युवती नहीं थी। वह एक राज्य स्तरीय टेनिस खिलाड़ी थी और अपने दम पर सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही थी। उसने टेनिस में कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया था और हाल ही में उसने एक टेनिस अकेडमी भी शुरू की थी, जहां वह बच्चों को टेनिस सिखा रही थी।
राधिका को खेलों से बेहद लगाव था और वह चाहती थी कि लड़कियों को खेलों में आगे बढ़ने का अवसर मिले। वह हमेशा कहती थी कि “खेल लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाते हैं” और इसी सोच के साथ उसने अकेडमी की शुरुआत की थी।

पिता को थी बेटी के फैसले से नाराजगी
जानकारी के अनुसार राधिका के पिता दीपक यादव को बेटी का अकेडमी चलाना पसंद नहीं था। उन्हें लगता था कि एक लड़की को घर के कामकाज तक ही सीमित रहना चाहिए। राधिका की सोच और जीवनशैली पिता से मेल नहीं खाती थी और इसी कारण घर में अक्सर झगड़े होते रहते थे।
एक पड़ोसी ने बताया कि,
“राधिका बहुत ही अच्छे स्वभाव की लड़की थी। वह बच्चों को टेनिस सिखाती थी और हमेशा मुस्कुराकर बात करती थी। कभी नहीं लगा कि घर में इतना तनाव चल रहा है।”
हत्या से पहले का झगड़ा
गुरुवार की सुबह भी राधिका और उसके पिता के बीच किसी बात को लेकर बहस हो रही थी। बताया जा रहा है कि बात इतनी बढ़ गई कि गुस्से में आकर दीपक ने अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर निकाली और राधिका की पीठ पर तीन गोली दाग दी। गोलियों की आवाज सुनकर घर के बाकी सदस्य और पड़ोसी दौड़कर आए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
आरोपी पिता गिरफ्तार
पुलिस ने राधिका के पिता दीपक यादव को मौके से ही गिरफ्तार कर लिया। उसके पास से हत्या में इस्तेमाल की गई लाइसेंसी रिवॉल्वर भी बरामद कर ली गई है।
पुलिस प्रवक्ता संदीप कुमार ने बताया कि,
“घटना की सूचना मिलते ही पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची। आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है। हत्या का कारण पारिवारिक विवाद प्रतीत हो रहा है। मामले की जांच की जा रही है और जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।”
राधिका की मौत पर इलाके में शोक
राधिका की मौत की खबर जैसे ही फैली, पूरा इलाका शोक में डूब गया। मोहल्ले के लोग, उसके कोच, दोस्त और अकेडमी के छात्र-छात्राएं सब गमगीन हैं।
एक स्थानीय कोच ने कहा,
“राधिका में बहुत टैलेंट था। वह बहुत मेहनती थी। वह लड़कियों के लिए रोल मॉडल थी। यह बहुत दुखद है कि एक पिता ने ही उसकी जिंदगी छीन ली।”
सवाल खड़े करता यह मामला
राधिका की हत्या केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि समाज में बेटियों की स्वतंत्रता और उनके फैसलों को स्वीकार न करने की मानसिकता को उजागर करता है। जब एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर बेटी को उसके अपने ही घर में मार दिया जाता है, तो यह केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की हार है।
महिला सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर बहस
यह मामला महिला सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी कई सवाल खड़े करता है। अगर घर में झगड़े हो रहे थे, तो क्या कभी किसी ने काउंसलिंग की कोशिश की? क्या समाज अभी भी बेटियों के फैसले को सम्मान नहीं दे पा रहा?
राधिका की याद में
राधिका अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी सोच, उसका सपना और उसका साहस लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगा। वह चाहती थी कि लड़कियां खेलें, आत्मनिर्भर बनें और समाज में अपनी पहचान बनाएं।
अब यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम उसकी उस सोच को आगे बढ़ाएं।
निष्कर्ष
गुरुग्राम की यह घटना जितनी दुखद है, उतनी ही चेतावनी भी है। यह बताती है कि समाज को अब बेटियों को उनके फैसले लेने की आजादी देनी होगी। उनके सपनों को सम्मान देना होगा और परिवारों को अपने नजरिए में बदलाव लाना होगा।
आज राधिका नहीं है, लेकिन हर राधिका को जीने का हक मिलना चाहिए।
