
गुजरात के वड़ोदरा में मसागर नदी पर बना 45 साल पुराना पुल एक ही झटके में टूट गया और 10 लोगों की जिंदगियां लील गया। ये कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी। ना कोई तूफान आया, ना कोई भूकंप, ना कोई चेतावनी। फिर भी दो ट्रक, दो कार, एक पिकअप वैन और एक रिक्शा उस पुल के साथ नदी की गहराई में समा गए।
लेकिन असली त्रासदी ये नहीं कि पुल टूटा, असली त्रासदी ये है कि सबको पता था ये पुल जर्जर है, सबको चेतावनी दी गई थी – लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया। और यही इस हादसे को सिर्फ एक तकनीकी चूक नहीं बल्कि एक सुनियोजित हत्या बनाता है – जिसमें दोषी हैं लापरवाह अफसर, भ्रष्ट ठेकेदार, और सोई हुई सरकारें।
🔹 “ये कोई हादसा नहीं था, ये अपराध था”
पुल टूटने की ख़बर आई तो शुरू में कुछ लोगों ने कहा, “अरे, हादसा हो गया…” लेकिन जब धीरे-धीरे सच सामने आया, तो समझ आया – ये हादसा नहीं, एक अपराध है।
एक ऐसा अपराध जिसमें कोई बंदूक नहीं थी, पर जानें गईं।
एक ऐसा अपराध जिसमें कोई आतंकी नहीं था, पर बच्चे मरे।
एक ऐसा अपराध जिसमें हाथ खून से नहीं सने थे, लेकिन लाशें पड़ी थीं।
🔹 पहले ही दी गई थी चेतावनी – फिर भी सब चुप
इस पुल की हालत बहुत खराब थी – ये कोई नई बात नहीं थी।
अप्रैल 2025 में ही एक स्थानीय पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि इस पुल में दरारें आ चुकी हैं।
उसने पुल की तस्वीरें, वीडियो और इंजीनियरों की रिपोर्ट के हवाले से बताया था कि पुल अब सुरक्षित नहीं है।
पर हुआ क्या?
- प्रशासन ने फाइलें घुमा दीं
- ठेकेदारों ने कहा – मरम्मत हो जाएगी
- सरकार ने कहा – जांच होगी
और आज नतीजा हमारे सामने है – 10 लोग मारे गए, लेकिन जिम्मेदार कोई नहीं।
🔹 मोरबी हादसे से कुछ नहीं सीखा
क्या आपको याद है, अक्टूबर 2022 का मोरबी पुल हादसा?
143 साल पुराना पुल गिरा था। 135 लोग मारे गए थे।
वो भी गुजरात ही था। तब भी यही हुआ था – जांच, हंगामा, वादे, भाषण, और फिर चुप्पी।
वहां भी जिम्मेदारों को बचा लिया गया।
यहां भी वही हो रहा है।
सवाल ये नहीं है कि पुल क्यों गिरा, सवाल ये है कि सिस्टम कब तक गिरेगा?
🔹 आंकड़े डराते हैं: हर महीने गिरते हैं 4 पुल
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक:
- 1977 से 2017 तक 2000 पुल टूट चुके हैं।
- पिछले 10 वर्षों में 500 से ज्यादा पुल गिर चुके हैं।
- यानी औसतन हर महीने 4 पुल गिरते हैं।
हर पुल के साथ कुछ जिंदगियां जाती हैं, कुछ परिवार उजड़ते हैं।
लेकिन सरकारें, नेता, और अफसर कुछ दिनों बाद भूल जाते हैं।
🔹 मरम्मत के नाम पर हर साल लूट
वड़ोदरा का यह पुल भी हर साल मरम्मत के नाम पर कागजों में “ठीक” होता रहा।
हर साल इसके नाम पर करोड़ों रुपये के बिल पास हुए,
लेकिन सीमेंट की जगह रेत डाली गई, लोहे की जगह जंग लगे सरिए लगाए गए।
सरकार को रिपोर्ट भेजी गई – “पुल सुरक्षित है”।
फाइलों में सब कुछ ठीक दिखाया गया।
लेकिन हकीकत? आज 10 लोगों की लाशें इस सिस्टम की पोल खोल रही हैं।
🔹 सवाल पूछने पर देशद्रोही बना दिया जाता है
आज अगर कोई पूछ ले –
- पुल किसने बनाया?
- किसने मरम्मत की रिपोर्ट पास की?
- किस इंजीनियर ने फाइनल अप्रूवल दिया?
- और किन अफसरों ने आंखें मूंदी?
तो उसे देशविरोधी, सरकार विरोधी या राजनीति करने वाला कहा जाएगा।
जब सवाल पूछना गुनाह बन जाए, तो समझिए सिस्टम सड़ चुका है।
🔹 अंग्रेजों ने 100 साल पहले जो बनाया, वो आज भी खड़ा है
हमारे देश में आज जो पुल बनते हैं, वो 10 साल भी नहीं टिकते।
लेकिन अंग्रेजों के ज़माने के बनाए पुल आज भी मजबूती से खड़े हैं।
वो लूटने आए थे, लेकिन जो बनाया – मजबूत बनाया।
और हम?
हम अपने ही देश के नागरिक होकर अपनी जान खो रहे हैं – उन पुलों पर जो घोटालों की नींव पर बने हैं।
🔹 ईमानदार को पागल, बेईमान को हीरो बना दिया है
ये भी हमारी मानसिकता का हिस्सा है।
जो नेता या अफसर रिश्वत लेकर बंगले, गाड़ियां, पैसे कमाते हैं,
हम उन्हीं को शान से शादी-ब्याह में बुलाते हैं, उनसे फोटो खिंचवाते हैं।
और जो कोई सिस्टम से लड़ता है, ईमानदारी से जीता है –
उसके बारे में कहते हैं – “अरे पागल है, हरिश्चंद्र बना हुआ है!”
जब तक हम बेईमानी को “स्मार्टनेस” और ईमानदारी को “पागलपन” मानते रहेंगे, तब तक ये पुल टूटते रहेंगे।
🔹 हमारी चुप्पी भी एक अपराध है
हम टैक्स देते हैं – सैलरी से कटता है।
हम सड़क पर टोल भरते हैं।
हम गैस पर, बिजली पर, हर चीज़ पर जीएसटी देते हैं।
लेकिन उसी पैसे से बने पुल पर जब हमारी जान जाती है,
तो हम चुप रह जाते हैं।
हमारी चुप्पी ही सिस्टम को बचाती है।
हमारी खामोशी ही उन भ्रष्ट अफसरों को और ताकत देती है।
🔹 अब वक्त है जवाब मांगने का
अब बहुत हो गया।
अब सवाल पूछो:
- कौन है इन 10 मौतों का जिम्मेदार?
- ठेकेदार कौन था?
- इंजीनियर कौन था?
- अफसर कौन था जिसने पुल को पास किया?
- कौन-सा मंत्री था जिसके दबाव में सब फाइलें पास हुईं?
अगर आज हमने जवाब नहीं मांगा,
तो अगली बार कोई अपना मरेगा – और हम फिर खामोश रहेंगे।
🔹 ये सिस्टम ऐसे नहीं बदलेगा – हमें बदलना होगा
ये पुल सिर्फ सीमेंट से नहीं बनते – ये जनता की उम्मीदों से बनते हैं।
और अगर सिस्टम बार-बार उन उम्मीदों को रौंद रहा है,
तो वक्त आ गया है कि हम आवाज़ उठाएं।
ईमानदार को इज्जत दो, बेईमान को समाज से बाहर करो।
सवाल पूछो, जांच की मांग करो, जवाबदेही तय करवाओ।
क्योंकि ये पुल, ये सड़कें, ये सरकारी इमारतें – सब हमारे पैसों से बनी हैं।
🔚 निष्कर्ष: अगर अब भी नहीं जागे, तो अगला पुल आपके अपने के नीचे टूटेगा
वड़ोदरा का यह हादसा एक चेतावनी है –
देश की हर गली, हर शहर, हर गांव में ऐसे सैकड़ों पुल हैं जो आज नहीं तो कल टूटेंगे।
अगर हम अब नहीं बोले, तो अगला मोरबी, अगला वड़ोदरा हमारे घर के पास होगा।
इसलिए चुप्पी तोड़ो। भ्रष्टाचार से समझौता मत करो।
हर सवाल का जवाब मांगो।
क्योंकि अगर आप नहीं बोले,
तो शायद अगली लाश किसी अपने की होगी – और तब पछताना बेकार होगा।
रिपोर्ट: अबिनव कुमार
स्रोत: ग्राउंड रिपोर्ट, स्थानीय मीडिया, प्रत्यक्षदर्शी बयान
