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भारत का गर्व: अंतरिक्ष से लौटे शुभांशु शुक्ला की ऐतिहासिक वापसी

krishna.jha jha
Last updated: July 15, 2025 11:50 am
krishna.jha jha 7 months ago
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली।
भारतीय अंतरिक्ष इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। भारत का झंडा पहली बार अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर लहराकर लौटे गगनयात्री शुभांशु शुक्ला अब सकुशल धरती पर लौट आए हैं। भारतीय समयानुसार सुबह 3 बजे, स्पेसएक्स का ड्रैगन कैप्सूल उन्हें और उनके तीन अन्य साथियों को लेकर प्रशांत महासागर में उतरा। यह पल 140 करोड़ भारतीयों के लिए गौरव, सम्मान और भावुकता से भरा हुआ था।

Contents
✨ भारत का गौरव बढ़ाने वाला मिशन🚀 अंतरिक्ष से धरती तक: कैसी रही वापसी की पूरी प्रक्रिया?1. डिपार्चर बर्न्स (Departure Burns)2. फेजिंग बर्न्स (Phasing Burns)3. डीऑर्बिट बर्न (Deorbit Burn)4. ट्रंक जेटीसन (Trunk Separation)5. री-एंट्री (पुनः प्रवेश)6. पैराशूट खुलना7. स्प्लैशडाउन (पानी में उतरना)⚠️ मिशन में आने वाली चुनौतियां🧪 वैज्ञानिक योगदान🇮🇳 अंतरिक्ष में भारत की नई पहचान🙌 निष्कर्ष: एक ऐतिहासिक उपलब्धि

शुभांशु शुक्ला, जो एक्सिओम स्पेस मिशन-4 (Ax-4) के तहत अंतरिक्ष में गए थे, उन्होंने 18 दिनों तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में रहकर कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किए। उनकी यह यात्रा भारत के अंतरिक्ष अभियानों की दिशा और दशा दोनों को नई ऊंचाइयों तक ले गई है।


✨ भारत का गौरव बढ़ाने वाला मिशन

भारत के लिए यह पहली बार था जब किसी भारतीय ने किसी निजी मिशन के तहत अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन तक जाकर वैज्ञानिक कार्यों में भाग लिया। इससे पहले भारत के राकेश शर्मा ने 1984 में सोवियत मिशन के तहत अंतरिक्ष की यात्रा की थी। इसके बाद अब शुभांशु शुक्ला का यह मिशन भारत के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए अंतरिक्ष में अपनी पहचान बनाने का संकेत है।


🚀 अंतरिक्ष से धरती तक: कैसी रही वापसी की पूरी प्रक्रिया?

अंतरिक्ष से धरती तक लौटना जितना रोमांचक है, उतना ही यह एक तकनीकी चुनौती भी है। यहां एक-एक कदम बेहद सटीक योजना, गणना और समर्पण से भरा होता है। शुभांशु शुक्ला को जिस स्पेसएक्स ड्रैगन यान से वापस लाया गया, उसकी वापसी प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है।

1. डिपार्चर बर्न्स (Departure Burns)

वापसी की शुरुआत तब होती है जब ड्रैगन कैप्सूल खुद को ISS से अलग करता है। इसके बाद यान छोटे-छोटे इंजन फायरिंग (burns) करता है ताकि वह स्पेस स्टेशन से दूर चला जाए और सुरक्षित रास्ते पर बढ़ सके।

2. फेजिंग बर्न्स (Phasing Burns)

इसके बाद यान धरती के वातावरण में प्रवेश के सही समय और दिशा को सुनिश्चित करने के लिए अपनी कक्षा (Orbit) में बदलाव करता है। यह प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यदि यह थोड़ी भी गलत हो जाए, तो स्प्लैशडाउन की जगह बदल सकती है।

3. डीऑर्बिट बर्न (Deorbit Burn)

यह वह चरण है जब यान धरती की ओर लौटने के लिए अंतिम निर्णय लेता है। इस दौरान यान के इंजन करीब 15-24 मिनट तक फायर करते हैं ताकि यान की गति कम हो सके और वह धरती के वातावरण की ओर बढ़ सके।

4. ट्रंक जेटीसन (Trunk Separation)

डीऑर्बिट बर्न पूरा होने के बाद, यान के पीछे जुड़ा ‘ट्रंक’ हिस्सा अलग कर दिया जाता है और उसे समुद्र में गिरा दिया जाता है। यह कदम यान को हल्का बनाता है और री-एंट्री को आसान करता है।

5. री-एंट्री (पुनः प्रवेश)

यान जब धरती के वातावरण में प्रवेश करता है, तो वह जबरदस्त घर्षण और गर्मी का सामना करता है। तापमान उस वक्त 1,900 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इसे सहन करने के लिए यान में विशेष हीट शील्ड लगी होती है जो यात्रियों को गर्मी से बचाती है।

6. पैराशूट खुलना

जब यान धरती के वातावरण में अच्छी तरह प्रवेश कर चुका होता है और गति कम हो जाती है, तब 5.5 किलोमीटर ऊपर दो ड्रोग पैराशूट खुलते हैं। फिर जैसे ही यान और नीचे आता है, 2 किलोमीटर की ऊंचाई पर चार मुख्य पैराशूट खुलते हैं, जिससे उसकी गति और धीमी हो जाती है।

7. स्प्लैशडाउन (पानी में उतरना)

चार मुख्य पैराशूट के जरिए ड्रैगन कैप्सूल करीब 27 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से प्रशांत महासागर में उतरता है। पानी में उतरने के बाद पैराशूट अपने आप अलग हो जाते हैं और स्पेसक्राफ्ट को विशेष नावों की मदद से बाहर निकाला जाता है।


⚠️ मिशन में आने वाली चुनौतियां

  1. गति और नियंत्रण:
    स्पेसक्राफ्ट को 28,000 किमी/घंटा की रफ्तार से पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश कराते हुए सटीक स्थान पर उतारना एक बड़ा तकनीकी कार्य है।
  2. पृथ्वी की घूर्णन गति:
    पृथ्वी हर समय घूमती रहती है, जिससे स्पेसक्राफ्ट के उतरने की दिशा लगातार बदलती रहती है। यह इंजीनियरिंग और गणनाओं को और कठिन बनाता है।
  3. मौसम की स्थिति:
    स्प्लैशडाउन के लिए मौसम की कई शर्तें होती हैं जैसे:
    • हवा की गति 16.5 किमी/घंटा से कम हो
    • लहरों की ऊंचाई 7 डिग्री से कम हो
    • 16 किमी के दायरे में बिजली न चमक रही हो
    • बारिश की संभावना 25% से कम हो
  4. हीट शील्ड पर निर्भरता:
    री-एंट्री के दौरान पूरा यान एक जलते गोले में बदल जाता है। उस वक्त यान की हीट शील्ड पर ही यात्रियों की जान टिकी होती है।

🧪 वैज्ञानिक योगदान

शुभांशु शुक्ला अपने साथ बहुत कीमती वैज्ञानिक डाटा लेकर आए हैं। यह डाटा अंतरिक्ष में मनुष्यों के व्यवहार, जैविक परिवर्तन, और शारीरिक प्रतिक्रियाओं से जुड़ा हुआ है। भविष्य में यही अध्ययन भारत के अंतरिक्ष अभियानों में मददगार साबित हो सकते हैं।


🇮🇳 अंतरिक्ष में भारत की नई पहचान

भारत अब सिर्फ सरकारी मिशनों तक सीमित नहीं रहा। निजी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक नई दिशा की ओर अग्रसर है। शुभांशु शुक्ला की यह उड़ान न सिर्फ वैज्ञानिक थी, बल्कि यह भारत की अंतरिक्ष महाशक्ति बनने की यात्रा का प्रतीक है।

इस मिशन से भारत ने यह साबित कर दिया कि उसके वैज्ञानिक, इंजीनियर, और अंतरिक्ष यात्री किसी भी वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। आने वाले समय में भारत और भी गगनयान और मानव मिशनों की ओर बढ़ेगा, और शुभांशु शुक्ला जैसे लोग उस भविष्य की नींव रख रहे हैं।


🙌 निष्कर्ष: एक ऐतिहासिक उपलब्धि

शुभांशु शुक्ला की वापसी सिर्फ एक स्पेस मिशन की समाप्ति नहीं, बल्कि यह भारत के आत्मनिर्भर और महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम का नया अध्याय है। उन्होंने न केवल विज्ञान और तकनीक में योगदान दिया, बल्कि उन्होंने हर भारतीय को यह विश्वास भी दिलाया कि हम भी सितारों तक पहुंच सकते हैं।

उनकी यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी और भारत को एक सशक्त अंतरिक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगी।


जय हिंद! 🚀🇮🇳

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